This Indian cricketer is now PhD.

किसने कहा- खेलने का मतलब पढ़ाई ख़त्म !
एक समय था जब इंजीनियर और इसी तरह की अन्य ऊंची डिग्री लेने वाले भारत के लिए क्रिकेट खेले। तब बहरहाल आज की तरह पूरे साल क्रिकेट नहीं थी। अगर सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली ज्यादा नहीं पढ़ पाए तो वजह का अंदाज़ा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं- स्कूल से क्रिकेट खेलने लगे और फुर्सत ही नहीं मिली। फिर भी इस सन्दर्भ में दो नई मिसाल का जिक्र बड़ा जरूरी है।  
हाल ही में मुंबई और भारत के पूर्व तेज गेंदबाज आविष्कार साल्वी (4 वन डे इंटरनेशनल) ने Astrophysics में पीएचडी (Doctor of Philosophy) पूरी कर ली है। Astrophysics एक ब्रांच है स्पेस साइंस की। आम तौर पर ये खबर आई कि वे भारत के इस बड़ी डिग्री को  हासिल करने वाले पहले क्रिकेटर बन गए हैं पर ऐसा नहीं है। ये एक अलग स्टोरी है कि और किन किन क्रिकेटर ने पीएचडी की डिग्री ली है। बहरहाल साल्वी की ये कोशिश तारीफ के योग्य है। 

वे इन दिनों खेल नहीं रहे पर क्रिकेट से लगातार जुड़े हुए थे और क्रिकेट को समय दे रहे थे। देखिए :*   रिटायरमेंट के बाद कोच बने। *   2018 में पुडुचेरी टीम के कोचिंग स्टाफ में थे। *   ओमान के कोच भी थे और उनके साथ ओमान ने टी 20 वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई किया।आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप क्वालीफायर 2019 के प्लेऑफ राउंड में हांगकांग को 12 रन से हराकर ओमान टी 20 वर्ल्ड कप में शामिल होने वाली आखिरी टीम बनी। 
अब दूसरी मिसाल। पिछले दिनों टोकियो पैरालंपिक में हरविंदर सिंह वह हासिल करने में कामयाब रहे जो आर्चरी में देश के लिए इससे पहले किसी ने हासिल नहीं किया था। हरियाणा के कैथल जिले के अजीतनगर गांव के 31 साल के हरविंदर ने व्यक्तिगत रिकर्व केटेगरी में इस खेल का भारत का पहला पैरालंपिक मैडल जीता। सेमीफाइनल में नंबर 10 अमेरिका के केविन माथेर से 6-4 (25-28, 24-24, 25-25, 25-24, 24-26) से हारने के बाद शानदार वापसी की और ब्रॉन्ज़ प्लेऑफ़ में, नंबर 23 हरविंदर ने कोरियाई प्रतिद्वंद्वी किम मिन सु को शूट-ऑफ में हराया।  डेढ़ साल के हरविंदर को डेंगू होने पर एक स्थानीय डॉक्टर ने एक ऐसा इंजेक्शन लगाया,जिसके कारण उसके पैरों ने ठीक से काम करना बंद कर दिया।
हरविंदर कभी भी अपनी विकलांगता से रुके नहीं। पढ़ते रहे और साथ में प्रैक्टिस।

सच तो ये है कि हरविंदर को आर्चरी के बारे में तब तक बहुत कम जानकारी थी, जब तक 2010 में पटियाला में पंजाबी यूनिवर्सिटी में पढ़ना नहीं शुरू किया था। यूनिवर्सिटी में ही पहली बार आर्चरी की ट्रेनिंग को देखा। लंदन 2012 पैरालंपिक में टेलीविजन पर इसे देखने के बाद ही खुद आर्चरी में मेहनत की। 
वे इकोनॉमिक्स में पीएचडी की डिग्री हासिल कर रहे हैं और इस डिग्री के काम के दौरान प्रैक्टिस के लिए समय निकालना आसान नहीं था। टोकियो जाने से 15 दिन पहले तक अपनी थीसिस सिनॉप्सिस जमा करने में व्यस्त थे। अपनी पीएचडी डिग्री पूरी करें- टोकियो से भारत लौटने के बाद उनका अगला लक्ष्य यही है। वे इसे ब्रॉन्ज़ जीतने से कम चुनौती वाला नहीं मानते। उनका टॉपिक Labour Reforms से जुड़ा है- अपनी थीसिस जमा करने पर अब उनका पूरा ध्यान है।
– चरनपाल सिंह सोबती 

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