This IAS officer is a medal hope at Tokyo Paralympics !

This IAS officer is a medal hope at Tokyo Paralympics !
टोकियो पैरालंपिक: एक ब्यूरोक्रेट जो मैडल का दावेदार है   

केबीसी के लिए एक और बड़ी इनामी रकम का सवाल : उस भारतीय ब्यूरोक्रेट का नाम बताइए जिसने पेशेवर इंटरनेशनल बैडमिंटन चैम्पियनशिप जीती हो? आसान नहीं है इस सवाल का जवाब।

जब पिछले साल मार्च में ये खबर आई कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री ने दिल्ली के बिलकुल करीब के नोएडा में कोविड-19 के केस एकदम बढ़ने और सरकारी तैयारियों की कमी के कारण, नोएडा के डीएम (डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) को बदल दिया- तो ये एक आम खबर ही थी। नए डीएम बने आईएएस अधिकारी सुहास लालिनाकेरे यतिराज। वे उत्तर प्रदेश कैडर से 2007 बैच के आईएएस हैं। इससे पहले इलाहाबाद, आजमगढ़, जौनपुर, सोनभद्र, हाथरस, महाराजगंज और अन्य क्षेत्रों के डीएम रह चुके हैं।
  
*  2016 : उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सिविल सम्मान यश भारती से सम्मानित।
*  2016 : प्रधानमंत्री जन धन योजना में बेहतर काम के लिए प्रधानमंत्री अवार्ड के लिए चुना गया।
 
अब इन्हीं सुहास का दूसरा परिचय- वे इंटरनेशनल स्तर के पैरा-बैडमिंटन खिलाड़ी भी हैं। बड़ी उपलब्धियां : 
 
*  2016 : बीजिंग,चीन में एशिया चैंपियनशिप में गोल्ड।
*  2017 : तुर्की में BWF टर्किश ओपन पैरा-बैडमिंटन चैंपियनशिप में सिंगल्स और डबल्स में गोल्ड।
*  2018 : इंडोनेशिया, जकार्ता में एशियाई पैरा खेलों में ब्रॉन्ज़।
 

अब टोकियो पैरालंपिक में भारत की बैडमिंटन टीम में उनका नाम है।सुहास लालिनाकेरे यतिराज (जन्म 2 जुलाई 1983) इस समय पैरा-बैडमिंटन पुरुष सिंगल्स में वर्ल्ड नंबर 2 हैं। टीम में नाम आते ही उन्होंने कहा था कि टोकियो में मैडल जीतना उनके लिए एक और चुनौती है। वे भगवत गीता की शिक्षाओं में विश्वास करते हैं- अपना कर्म करो और आपको नतीजा मिलेगा। जहां तक टोकियो में मैडल का सवाल है, दुनिया में दूसरे नंबर पर होने के नाते, मैडल की उम्मीद गलत नहीं पर वे इसका दबाव नहीं लेते।


पिछले डेढ़ साल में, उन्होंने कोविड की हालत में काम के बाद रात में बैडमिंटन में प्रैक्टिस और ट्रेनिंग की। सुहास अन्य दूसरे माता-पिता से भी कहते हैं कि अपने विकलांग बच्चों को खेलों के लिए बढ़ावा दो। अपने लिए वे मानते हैं कि आज जो कुछ भी हैं- अपने  माता-पिता की वजह से हैं, जिन्होंने कहा जो चाहते हो उसे करो।
शारीरिक कमियों को दूर करना अक्सर एक विकलांग व्यक्ति के लिए एक चुनौती बन जाता है। सुहास ने कभी ऐसा नहीं होने दिया। वे कर्नाटक के रहने वाले हैं। पिता एक सरकारी कर्मचारी थे और पिता की अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग के कारण अलग-अलग शहरों में पढ़ाई पूरी की। 2004 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सुरथकल, कर्नाटक से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में डिस्टिंक्शन के साथ ग्रेजुएशन किया।

उन्हें टोकियो पैरालंपिक के लिए टीम में जगह तब मिली जब वर्ल्ड बैडमिंटन फेडरेशन ने दो अतिरिक्त जगह का कोटा दिया- वे सिंगल्स एसएल 4 इवेंट में हैं। वे देश के लिए एक और गोल्ड जीतने के लिए तैयार हैं। उनके सपने और उनकी कहानी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।
– चरनपाल सिंह सोबती
Show Buttons
Hide Buttons