टोकियो पैरालंपिक: आदित्य मेहता को अपने लिए मैडल की चिंता नहीं – भविष्य के पैरालंपियन की तलाश है

टोकियो पैरालंपिक: आदित्य मेहता को अपने लिए मैडल की चिंता नहीं – भविष्य के पैरालंपियन की तलाश है


सब अपने लिए मेहनत कर रहे हैं – पैरा साइकिलिस्ट आदित्य मेहता इनसे अलग हैं। वे देश के लिए भविष्य के पैरालंपियन की तलाश भी कर रहे हैं। साइकिलिंग में भारत के पहले एशियाई पैरापैरालंपिक मैडल विजेता, आदित्य मेहता ने खुद एक एक्सीडेंट में एक अंग खो दिया – ये उनकी हिम्मत ही थी कि उसके बाद देश के टॉप पैरा-एथलीट में से एक बनने के लिए ट्रैक पर आए।
 
24 साल की उम्र में एक पैर खोया – अब वे 38+ हैं और भारत के लिए पैरा-साइकिलिंग में कई मैडल हासिल कर चुके हैं। चुनौतियों से लड़ने और उनसे पार पाने की इच्छाशक्ति दिखाई लेकिन चैंपियन के लिए इतना ही काफी नहीं था। अब देश भर के अन्य विकलांग एथलीट की तलाश करने, उन तक पहुंचने और उनके सपनों और इरादों को पूरा करने में मदद करने के लिए वे एक अभियान चला रहे हैं। उन्हें लगता है कि भारत को पैरालंपिक में और ज्यादा मैडल हासिल करना चाहिए और ऐसा हो – इसे पक्का करना, अपने मिशन में से एक बना लिया है। वे कहते हैं – ‘पैरालंपिक में लगभग 1500 मैडल उपलब्ध हैं। रियो 2016 पैरालंपिक में भारत ने चार मैडल जीते लेकिन, 2024 तक, हम चीनी और यूरोपीय टीमों की बराबरी करना चाहते हैं।’

क्या है आदित्य मेहता की कहानी? वे हैदराबाद के एक इंडस्ट्रियलिस्ट हैं – उनकी जिंदगी 18 अगस्त, 2017 को हांगकांग से लौटने के बाद एकदम बदल गई। मेहता अपनी मोटरसाइकिल पर थे सड़क पर लेकिन एक बस ने उन्हें करीब 200 मीटर तक घसीटा दिया। कोशिश की कि अपने शरीर को बस के पहियों के बीच में रखें पर अपने एक पैर को रास्ते से हटा नहीं पाए।

 

सबसे पहले तैराकी शुरू की और पुणे में एक एकेडमी में शामिल हो गए। एक दिन साइकिल चलाने का इरादा किया – एक पैर से साइकिल की सवारी की और कई बार गिरे पर उठे और ऐसा करते रहे। मेहता कहते हैं कि हर गिरावट ने उन्हें और मजबूत किया। वहीं से साइकिल को साथी बना लिया। अपनी पहली रेस में शामिल होने में 6 साल लग गए। आज वे देश के सबसे कुशल पैरा-साइकिल चालक में से एक हैं और पैरा-एशियन चैंपियनशिप में दो सिल्वर जीते। लंदन से पेरिस तक साइकिल चलाई। उनके नाम पर दो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स एंट्री हैं – 2013 में कश्मीर से कन्याकुमारी, भारत की लंबाई तक अकेले साइकिल चलाई।

2013 में ही उन्होंने अपने जैसे एथलीटों की मदद के लिए एक फाउंडेशन की शुरुआत की थी। मेहता का दावा है कि फाउंडेशन ने तब से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 100 से अधिक पैरा-एथलीटों और 1000 सैनिकों की मदद की है। 2020 में मेहता और साथी पैरा-साइकिल चालक ने बीएसएफ के विकलांगों की टीम के साथ पूरे भारत में 3801 किमी लंबी साइकिलिंग इवेंट में हिस्सा लिया – 41 दिनों में 35 शहर श्रीनगर से  कन्याकुमारी  के बीच ।

भविष्य के पैरा पैरालंपियनों की खोज के पीछे क्या मकसद है? मेहता ने अपने जीवन में मुश्किल हालात को देखा है। 2013 में नई दिल्ली में एशियाई पैरा-साइक्लिंग चैंपियनशिप में, मेहता और उनके साथी इसलिए हिस्सा नहीं ले पाए  क्योंकि उन्हें प्रोस्थेटिक्स और व्हीलचेयर खरीदने के लिए पूरा पैसा और समर्थन नहीं मिला। ऐसे में उन का परिवार कुछ पैरालंपियनों की मदद के लिए आगे आया। उसके बाद, उन्होंने खुद पैरालंपियनों के लिए धन जुटाने का फैसला किया।अब उनका लक्ष्य पैरालंपिक के बारे में जागरूकता बढ़ाना और अपने जैसे एथलीटों तक पहुंचना है।
हैदराबाद के बाहरी इलाके में बेगमपेट में एशिया की पहली पैरा स्पोर्ट्स एकेडमी शुरू की और रिहैबिलिटेशन सेंटर खोला। 5,000 वर्ग फुट की इन्फिनिटी पैरा-स्पोर्ट्स एकेडमी सभी 28 पैरा स्पोर्ट्स, ट्रेनिंग सुविधाओं, डाइट, रहना और यहां तक कि जरूरी  उपकरणों के लिए हर मदद और पूरी स्क्रीनिंग  का इंतज़ाम करती है।अब तक 100 से अधिक पैरा एथलीट ने फाउंडेशन से फायदा उठाया है, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) के 1,000 से अधिक उन जवानों की काउंसलिंग की है जो गंभीर रूप से घायल हैं। 
 
इरादा पक्का हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं।  
 
– चरनपाल सिंह सोबती 
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