Now Government walking the talk for medals at Olympics

Now   walking the talk
अब सिर्फ बातें नहीं हैं – ओलंपिक मैडल के लिए सरकार मदद के लिए तैयार है 
 

टोकियो ओलंपिक मैडल लिस्ट में भले ही भारत का नाम टॉप 50 देश में भी नहीं है इस समय तक पर इतना सच है कि कुछ प्रदर्शन ऐसे हुए जिनसे देश का सम्मान बढ़ा। ये साबित हुआ कि अब सिर्फ गिनती बढ़ाने के लिए ओलंपिक में  हिस्सा लेने नहीं जाते – ऐसे ही मेहनत जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के नाम भी ढेरों मैडल होंगे। ये सब बिना किसी स्कीम या पॉलिसी के नहीं हुआ – खिलाडियों ने मेहनत की और सरकार ने उन्हें बेहतर तैयारी के लिए विश्व स्तर की सुविधाएं मुहैया कराने में कोई कमी नहीं रखी।

 

जो नज़ारा है उसमें अगर आने वाले सालों में भारत एक खेल महाशक्ति बन जाए तो कोई हैरानी नहीं होगी। युवा मामलों और खेल मंत्रालय ने सिर्फ खेलों और खिलाड़ियों के बारे में सोचा। असल में हर ओलंपिक में नाकामयाबी के बाद होता ये था कि कुछ बातें और फिर सब पहले की तरह चल पड़ता था। 2008 और 2012 ओलंपिक के बाद सरकार ने इस सवाल को बड़ी गंभीरता से लिया कि ज्यादातर भारतीय एथलीट टेलेंट और स्किल के बावजूद दुनिया के सबसे बेहतर खिलाड़ियों में क्यों नहीं आ पाते? इसी को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने सितंबर 2014 में टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) शुरू की ताकि बेहतर टेलेंट की पहचान की जा सके और उन्हें जरूरी इक्विपमेंट और बेहतर ट्रेनिंग देकर प्रदर्शन सुधारने में मदद की जा सके। देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के इरादे से खेलो इंडिया स्कीम शुरू की गई – देश के अलग अलग इलाकों से एथलीट की खोज की और उन्हें फाइनेंशियल मदद देकर सामने आने के लिए एक मंच प्रदान किया गया। इस बार ओलंपिक में 127 खिलाड़ी 18 खेल की इवेंट में हिस्सा लेने यूं ही नहीं भेज दिए गए।
 
19 जुलाई 2021 को ही राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में खेल मंत्री ने बताया कि सरकार ने भारतीय एथलीटों/टीमों को ट्रेनिंग, विदेश में टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के खर्चे में कोई कमी नहीं रखी ताकि मैडल जीतने के अवसर बढ़ें। यहां तक कि कोविड लॉकडाउन के दौरान SAI के मार्फ़त एथलीटों को जरूरी खेल इक्विपमेंट पहुंचाए गए ताकि अपने घरों में ही ट्रेनिंग जारी रख सकें।  
 
इस साल जब देश के बजट में खेल मंत्रालय को मिली रकम कम की गई थी तो हैरानी हुई थी पर सरकार ने वायदा किया था कि ओलंपिक साल में किसी भी तरह की कमी नहीं रखी जाएगी और वैसा ही हुआ। टोकियो में पहले ही दिन सिल्वर जीतने वाली मीराबाई चानू की मिसाल से इस पूरे नज़ारे को बड़ी अच्छी तरह से समझा जा सकता है। उनकी ओलंपिक मैडल जीतने की तैयारी पर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए TOPS  के अंतर्गत।एथलीट को एक दिन में कामयाबी नहीं मिलती – उनके प्रदर्शन, सिस्टम और उन्हें  दी सुविधाओं की मिली जुली कोशिश का नतीज़ा है ये कामयाबी।

SAI के अनुसार, पिछले कुछ सालों में सरकार ने एथलीटों पर 1,200 करोड़ रुपये खर्च किए हैं – ACTC और TOPS स्कीम में ।मीराबाई चानू को नवंबर 2018 में TOPS में शामिल किया गया था और उन्हें आउट-ऑफ-पॉकेट अलाउंस , इक्विपमेंट और ट्रेनिंग, इंटरनेशनल आयोजन में भागीदारी, स्पोर्ट्स साइंस को समझने के लिए 51.51 लाख रुपये दिए गए ।फिट न होने पर दो बार USA  भेजा रिहैबिलिटेशन के लिए जिस पर 1.3 करोड़ रुपए खर्च हुए। भारत के कई टॉप एथलीट इस स्कीम का हिस्सा हैं – SAI की वेबसाइट के अनुसार 106 एथलीट/ टीमें TOPS का हिस्सा हैं। ACTC  के अंतर्गत लगभग 1100  करोड़ रूपए खर्च किए गए –  विदेशी ट्रेनिंग और अन्य इंतज़ाम पर। 
 
इन्हीं सब मिली जुली कोशिशों ने एथलीटों की मौजूदा कामयाबी में योगदान दिया –  दुनिया के सबसे खेल मेले ओलंपिक में अपना जलवा दिखाया और ये सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। मीराबाई चानू पर 5 साल में जो 2.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए TOPS में – वे एक ओलंपिक मैडल के सामने कुछ भी नहीं। सरकार मदद के लिए तैयार है – जरूरत है देश में एक स्पोर्ट्स कल्चर बनाने की।
-चरनपाल सिंह सोबती 
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