कोविड ने ओलंपिक बजट बिगाड़ दिया – जापान भी इसका असर सालों महसूस करेगा

तो अब तो ये चर्चा ख़त्म ही हो गई कि कौन क्या सोचता है इन ओलंपिक के बारे में? ओलम्पिक हो रहे हैं और एथलीट टोकियो पहुँच रहे हैं। 
 
कोविड की वजह से स्थगित होने के बाद, जो ये चाहते थे कि इन ओलंपिक को रद्द कर दिया जाना चाहिए- उनकी ऐसी सोच के पीछे एक वजह ये भी थी कि इस सब का खर्चा कौन उठाएगा? लोग डर रहे थे कि अगर ओलंपिक के नाम पर खर्चा बढ़ा तो क्या होगा देश का? ओलंपिक रद्द करते तो ओलंपिक में  कई मिलियन डॉलर डूब गए समझो। इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (IOC) की टेलीविजन से  कमाई गई (उन्हें 73% पैसा ब्रॉडकास्ट अधिकारों को बेचने से मिलता है और 18% स्पांसर से)। अमेरिकी  ब्रॉडकास्टर एनबीसी ने टोकियो के अधिकारों के लिए $ 1 बिलियन से ज्यादा का भुगतान करना है। समर और विंटर ओलंपिक – यही तो हैं IOC के पास। खेल रद्द होते तो उनका भी सारा बजट गड़बड़ हो जाता – इससे पूरी दुनिया में खेलों की कई डेवलपमेंट स्कीम पर भी असर आता।  
 
चीन में जल्दी ही बीजिंग विंटर ओलंपिक हैं। तारीखों के साथ कोई भी छेड़छाड़ उनका प्रोग्राम भी गड़बड़ा देती। जापान खासकर चीन के साथ अपनी प्रतिद्वंद्विता के मद्देनजर दिखाना चाहता है कि वे कहाँ हैं पर हालात बेकाबू होते जा रहे थे  । अगर जापान पहले पोस्ट-कोविड ओलंपिक का मेजबान बनने में नाकामयाब रहता तो यह श्रेय चीन को मिल जाता और जापान ये भी नहीं चाहता था ।
  
इसलिए टोकियो ओलंपिक को आयोजित करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं था पर ये भी जरूरी था कि ओलंपिक का बजट और न बिगड़े। रिकॉर्ड के हिसाब से ये सबसे महंगे समर ओलंपिक हैं। इसीलिए IOC और मेजबान ओलंपिक एसोसिएशन ने कोशिश की, भले ही ओलंपिक की भव्यता कुछ कम हो जाए- ऐसी नौबत न आए कि खेलों को रद्द / स्थगित करना पड़े। खर्च कम कर दिया पर किसी हिस्सा लेने वाले देश को नहीं कहा कि छोटी टीम भेजो। कुल 15,400 एथलीट के ही ओलंपिक और पैरालंपिक में शामिल होने की उम्मीद है और शुरू से यही गिनती चल रही थी। 121 दिन की मशाल रिले, उद्घाटन और समापन समारोह की भव्यता भी कम नहीं की है।
आयोजकों और IOC का कहना है कि कोविड के कारण ओलंपिक स्थगित करने से पहले ही वे कई बिलियन डॉलर खर्च कर चुके थे। ज्यादातर बड़े- बड़े खर्च पहले ही हो चुके थे – जैसे कि 1.43 बिलियन अमरीकी डॉलर लागत का नेशनल स्टेडियम और 520 मिलियन डॉलर की कीमत पर बना स्विमिंग पूल। जो कंस्ट्रक्शन ओलंपिक को स्थगित करने तक नहीं हुई थी – उसे रोक दिया और तय किया कि मौजूदा सुविधाओं का ही इस्तेमाल करेंगे।
  
इस तरह कितनी बचत की? इसका कोई ऑफिशियल हिसाब नहीं लेकिन जानकारों का कहना है कि ये बचत, ओलंपिक के 12.6 बिलियन अमरीकी डालर के खर्च का 1-2 प्रतिशत तक ही हुई है – इससे ज्यादा नहीं। दूसरी तरफ इन सब कोशिशों को महज ‘धोखा’ बताने वाले भी कम नहीं। पिछले साल एक सरकारी ऑडिट में कहा गया था कि ओलंपिक की वास्तविक लागत अनुमान से दो गुना ज्यादा हो सकती है।
 
पालिसी ये है कि 12.6 बिलियन अमरीकी डालर के खर्च में से बड़ा हिस्सा पब्लिक मनी है। 5.6 बिलियन अमरीकी डालर प्राइवेट फाइनेंसिंग से आए – इसका लगभग 60 प्रतिशत 3.3 बिलियन अमरीकी डालर बनता है, जो 68 घरेलू स्पांसर दे रहे हैं। इसमें भी गड़बड़ ये हुई है कि ओलंपिक टलने से कई स्पांसर भाग गए। उन्हें रोकने का प्रोजेक्ट अलग से चलाना पड़ा। घरेलू प्रायोजकों में जापानी एयरलाइन एएनए सहित कई बड़ी कंपनियां हैं जो खुद बड़ा घाटा झेल रही हैं।
  
एक रिपोर्ट कहती है कि ओलंपिक स्थगित करने की लागत 1.9 बिलियन अमरीकी डालर आई जबकि योमीरी अखबार ने एक रिपोर्ट में कहा कि ओलंपिक स्थगित होने के कारण ओलंपिक आयोजन की लागत लगभग 200 बिलियन येन (1.9 अरब डॉलर) बढ़ गई। इसी अखबार ने बताया कि खेलों की लागत 1.35 ट्रिलियन येन (13 अरब डॉलर) है। अधिकृत तौर पर इन अनुमान का कोई जवाब नहीं दिया जा रहा।
  
कुछ भी हो ये तो सच है कि टोकियो गेम्स बहुत महंगे हैं। ओलंपिक पर लगाने की आधिकारिक लागत $ 12.6 बिलियन थी जबकि टोकियो ने 2013 में मेजबानी जीतने पर कहा था कि खेलों पर 7.3 बिलियन डॉलर का खर्च आएगा। इसका मतलब है कि बजट तो शुरू से ही हिल गया। इस तरह टोकियो रिकॉर्ड पर सबसे महंगे समर ओलंपिक हैं और मीटर अभी भी चल रहा है। एक बड़ा खर्चा तो खैर कोविड के कारण भी आया – अनुमान है 100 बिलियन येन (लगभग 1 बिलियन डॉलर) कोविड से जुड़ी कार्रवाई पर खर्च होंगे। इसमें वैक्सीन की लागत, तेजी से टेस्ट करना और कोरोनावायरस से बचाव की कोशिशें शामिल हैं।
स्विट्जरलैंड स्थित IOC का घबराना स्वाभाविक है – बढ़ता खर्चा उनकी कमाई पर भी असर डालेगा। वे आगे हर देश की ओलंपिक कमेटी को देने वाली मदद में कटौती करेंगे जबकि कई कमेटी तो पूरी तरह उन पर ही आश्रित हैं। IOC के अपने स्पांसर अलग हैं, जिनमें तीन प्रमुख जापानी ब्रैंड – पैनासोनिक, टोयोटा और ब्रिजस्टोन शामिल हैं। दर्शकों की गिनती कम तो इसका इकोनॉमिक बोझ सीधे जापान पर आ रहा है। एक अंदाजा था कि बजट  में टिकटों की बिक्री से 800 मिलियन डॉलर की रकम आएगी –  बजट में तीसरा सबसे बड़ा हिस्सा। अब दर्शक कम तो पैसा भी कम। कुल मिलाकर, जापान ऑफिशियल तौर पर ओलंपिक आयोजित करने के लिए 15.4 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। कई सरकारी ऑडिट में कहा गया है कि वास्तविक लागत इससे दोगुनी हो सकती है। इसमें से सिर्फ 6.7 बिलियन डॉलर पब्लिक इन्वेस्टमेंट नहीं हैं। जापान के निवासियों को लगभग 4.45 मिलियन टिकट बेचे गए। अब बचे हुए टिकट भी  उन्हें ही बेचे जा रहे हैं। 
 
ये सब भी जापान जैसा देश ही संभाल पाया क्योंकि जापान कोई साधारण देश नहीं है। वे एक इकोनॉमिक पावर हैं जो किसी भी चुनौती का सामना करने का दम रखते हैं। इस आख़िरी मुकाम पर अपनी प्रतिष्ठा को धूमिल नहीं होने देगा जापान।    
 
– चरनपाल सिंह सोबती 
Feature image By Pixabay is symbolic
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