तो अब ओलंपिक लौट रहे हैं !

अब यह लगभग तय है कि सभी मुश्किल को पार करते हुए इस साल का सबसे बड़ा खेल आयोजन यानि कि टोकियो ओलंपिक होंगे। जापान से 31 दिसंबर की रात को  कोई न तो दुबई में बुर्ज़ खलीफा और न ही सिडनी में सिडनी हारबर पर लाइटिंग और आतिशबाज़ी देखने गया होगा क्योंकि  खुद टोकियो में टोकियो स्काईट्री बिल्डिंग चमचमा रही थी सुनहरी रंग में। ये जापान में सबसे ऊंची मीनार है। ये गोल्ड चमचमाहट नए साल के स्वागत की नहीं – टोकियो ओलंपिक के लिए काउंटडाउन की शुरुआत की थी। जापान में हर कोई जानता था कि ये ऐतिहासिक ओलंपिक लाइटिंग देखने का मौका जिंदगी में शायद ही फिर कभी मिले। टोकियो ने ओलंपिक खेलों का स्वागत  किया।  
 
टोकियो स्काईट्री पर गोल्ड चमचमाहट शुरू हुई 15 दिसंबर – इससे ठीक 100 दिन बाद यानि कि 25 मार्च 2021 को ओलंपिक मशाल रिले शुरू हुई फुकुशिमा के पूर्वी इलाके से। इस साल ओलंपिक 23 जुलाई से हैं- 23 जुलाई से 8 अगस्त तक। ये वही ओलंपिक हैं जो 2020 मेँ नहीं हो पाए थे। मुख्य ओलंपिक में 11,000 एथलीट और इनके साथ पैरालिम्पिक्स में 4,400 एथलीट हिस्सा लेंगे और ये एक बड़ा खेल मेला होगा। ओलंपिक और जापान तैयार है इन सभी के स्वागत के लिए।
 इससे पहले कभी भी ओलंपिक खेलों को युद्ध के अलावा किसी अन्य  घटना के लिए स्थगित या रद्द नहीं किया था। इसके लिए जिम्मेदार है कोरोनोवायरस यानि कि COVID-19  जिसने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। उद्घाटन समारोह 24 जुलाई 2020 को था। उससे पहले ही हालत देखते हुए, ओलंपिक को एक साल के लिए स्थगित करने पर सहमति देनी पड़ी। इस तरह ओलंपिक एक साल टले पर 2021 में आयोजन के बावजूद इन्हें ओलंपिक और पैरालम्पिक गेम्स टोक्यो 2020 ही कहा जाएगा।
जिन ओलंपिक तारीखों को युद्ध के अलावा किसी अन्य घटना या वजह के लिए बदला नहीं गया था, उन्हें बदलना जरूरी हो गया था। 1916, 1940 और 1944 में,  वर्ल्ड वॉर के कारण खेलों को रद्द कर दिया था। एक साल टालने के बाद ओलंपिक लौट रहे हैं और जब ओलंपिक लौटते हैं तो असर साफ़ दिखाई देता है। इससे पहले आखिरी बार ये नज़ारा 1948 में देखने को मिला था जब लगातार दो ओलंपिक न होने के बाद ओलंपिक की वापसी हुई थी।1948 के लंदन ओलंपिक ने दुनिया को वापस अपनी राह पर लाने और मनोबल बढ़ाने वाली भूमिका निभाई थी।
  
1948 के लंदन ओलंपिक और 2020 टोकियो ओलंपिक में एक ख़ास फर्क ये है कि टोकियो ओलंपिक के लिए पहले से ही भव्य इंतज़ाम हो चुका था, बड़ा खर्चा हो चुका था। 1948  के लिए हालात पहले ही मालूम थे और पैसा भी नहीं था इसलिए भव्यता वाली तो कोई बात ही नहीं थी। जब दुनिया युद्ध से उबर रही थी तो लंदन 1948 खर्चा  नहीं उठा सकता था। लंदन के कई हिस्सों में हुए धमाके के निशान ओलंपिक के दौरान मौजूद थे। ब्रिटेन में रहने वालों के लिए ज्यादातर इंतज़ाम और रोज़मर्रा की जरूरतों  की सख्त कमी थी।
 
टोकियो गेम्स विलेज बन चुका था जबकि 1948 में पुरुष एथलीटों को रॉयल एयर फोर्स कैंप  में रखा गया और महिलाएं कॉलेजों में रहीं। न तो नया ओलंपिक स्टेडियम था और न ही कोई नया वेलोड्रोम, एक़्वेटिक्स सेंटर या हैंडबॉल खेलने का इंतज़ाम। आयोजकों ने बिस्तर जुटाए पर एथलीटों को अपने खुद के तौलिए लाने के लिए कहा गया था। उन्होंने वेम्बली को ग्राउंड ट्रैक के ऊपर 800 टन का सिलिन्डर डालकर एक एथलेटिक्स स्टेडियम में बदल दिया था। इसीलिए कोई हैरानी नहीं कि 1948 के ओलंपिक को ‘ऑस्टेरिटी गेम्स’ कहा जाता है। ब्रिटिश एथलीटों के लिए तो ये भी मुश्किल था कि वे अपने लिए जरूरत की सही खुराक का इंतज़ाम कर लें। इन्हीं कमियों के कारण, मेजबान देश होने के बावजूद वे सिर्फ 3 गोल्ड ,14 सिल्वर और 6 ब्रॉन्ज़ जीत पाए। कई टीमें खेलों के लिए अपना राशन साथ लाईं।
 
फिर भी खेलों को आज भी 30 साल की डच मां फैनी ब्लैंकर्स-कोइन के करतबों के लिए याद किया जाता है, जिन्होंने 4 गोल्ड जीते और चेकोस्लोवाकिया के एमिल जाटोपैक ने 10,000 मीटर का गोल्ड जीता। भारत के लिए, पहली बार एक स्वतंत्र देश के तौर पर ओलंपिक में हिस्सा ऐतिहासिक था तो साथ ही लगातार चौथा हॉकी  गोल्ड भी – वह भी ब्रिटेन को हराकर, उनके ही घर में।
 
59 देशों ने हिस्सा लिया था। पराजित शक्तियों जापान और जर्मनी को बाहर रखा गया। सोवियत संघ ने हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था। तब भी 1948 के ओलंपिक में लगभग 30,000 पाउंड मुनाफा हुआ जो मौजूदा बजट के आंकड़ों में सोचा भी नहीं जा सकता। 
 
एमिल जाटोपैक  ने 1948 खेलों के ख़त्म होने पर कहा था: “उन सभी काले दिनों के बाद – बमबारी, हत्या, भुखमरी – ओलंपिक खेलों की फिर से शरूआत ऐसी थी मानो सूरज निकल आया हो… अचानक कोई बॉउंड्री नहीं थी, और कोई रूकावट नहीं, बस लोग एक साथ मिल रहे हैं। ”
 
इस साल क्रिकेट से अगर, खेल के मैदान में कोई चर्चा छीनेगा, तो वे टोकियो ओलंपिक होंगे।  
 
  – चरनपाल सिंह सोबती   
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