Who is our highest archery medal hope?

दीपिका कुमारी- ओलंपिक में आर्चरी में मैडल के लिए भारत की सबसे बड़ी उम्मीद हैं 
 
इस साल जुलाई में पेरिस में आर्चरी यानि कि तीरंदाजी महिला रिकर्व टीम इवेंट के ओलंपिक क्वालिफायर के लिए जिन तीन तीरंदाज़ ने क्वालिफाई किया – तीनों झारखंड की हैं पर कामयाबी के लिए जो उम्मीद दीपिका कुमारी से लगाई जा रही है वह सबसे अलग है। दीपिका खुद ओलंपिक में सिंगल्स के लिए न सिर्फ क्वालिफाई कर चुकी हैं, बल्कि एक मैडल के लिए भारत की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।

कामयाबी में किसी से काम नहीं। कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड विजेता और वर्ल्ड नंबर 1 रही, दीपिका इस समय देश की अकेली ऐसी महिला तीरंदाज हैं जिन्होंने 2019 में बैंकॉक में एशियन सबकॉन्टिनेंट क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट में गोल्ड जीतने के बाद टोकियो खेलों में  जगह बनाई।ये उनके तीसरे ओलंपिक होंगे (इससे पहले :2012 एवं 2016) । पिछले दोनों में एक कमी रह गई थी – ओलंपियन होने के बावजूद, ओलंपिक उद्घाटन समारोह में हिस्सा नहीं लिया और उन्हें उम्मीद है कि इस बार ये मौका जरूर मिलेगा।26 साल की , रांची की, दीपिका इस समय वर्ल्ड नंबर 9 हैं ।

 
 जन्म 13 जून,1994 को रांची में हुआ। टारगेट प्रैक्टिस में बचपन में ही माहिर हो गईं क्योंकि पेड़ों से लटके आमों पर पत्थर फेंक कर तोड़ती थीं। पिता एक ऑटो-रिक्शा चलाने वाले, मां नर्स – दीपिका रांची से 15 किमी दूर एक गाँव रातू चट्टी की रहने वाली हैं। चूंकि पेशेवर तीरंदाजी  का सामान तो  खरीद नहीं  सकते थे, इसलिए घर के बने बांस के धनुष और तीर से ही काम चलाया। चचेरी बहन, आर्चर विद्या कुमारी की मदद से टाटा आर्चरी एकेडमी में जगह मिली तो वहां से सही तरीके की ट्रेनिंग शुरू हुई।
  
पहली बार नाम चमका जब 2009 में कैडेट विश्व चैम्पियनशिप जीती। उसी साल अमेरिका के ओग्डेन में 11 वीं  यूथ वर्ल्ड आर्चरी चैम्पियनशिप भी जीती।उसके बाद तो : 

* 2010 : व्यक्तिगत रिकर्व ( individual recurve ) और महिला टीम इवेंट में गोल्ड।  
* ग्वांग्झू में 2010 एशियाई खेल : ब्रॉन्ज़ मैडल।  
* 2010 ट्यूरिन, इटली में वर्ल्ड आर्चरी चैंपियनशिप : महिला टीम इवेंट में सिल्वर।  
* ओलंपिक 2012 लंदन : मौसम और हवा रास नहीं आए और पहले राउंड में ही हार।  
* रियो 2016 : प्रभावशाली स्कोर के साथ 64 और 32 के राउंड में जगह बनाई पर 16 वाले राउंड में हार गई।
 
अब दीपिका को ओलंपिक मैडल जीतने का तीसरा मौका मिल रहा है और ऐसा मौका हर किसी को नसीब नहीं होता।ये वही दीपिका हैं जिन्होंने पुरुष आर्चरी टीम के अतनु दास से अभी कुछ दिन पहले शादी की।  
 
दीपिका एक मिसाल हैं इस बात की कि कैसे कम-से-कम साधन से कड़ी मेहनत और अटूट आत्मविश्वास से सब बदल सकते हैं। वह परिवार जिसे दिन में तीन बार के खाने की गारंटी नहीं, उस परिवार की बेटी ने टाटा आर्चरी एकेडमी में ट्रेनिंग ली। खाना, रहने का अच्छा इंतज़ाम और ट्रेनिंग – उसके लिए ये सब एक लक्जरी था। साथ ही उसे 500 रुपये महीने का स्कॉलरशिप मिल गया। 2012 में भारत के दूसरे सबसे बड़े खेल पुरस्कार अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित। 2016 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया और 2014 में फिक्की स्पोर्ट्सपर्सन ऑफ द ईयर अवार्ड। दो कोच हैं, धर्मेंद्र तिवारी और पूर्णिमा महतो हैं । टाटा एकेडमी से ये ट्रेनिंग दे रहे हैं। सिर्फ तीरंदाजी की ट्रेनिंग नहीं, जिंदगी को संभालने की भी ट्रेनिंग दी।  
 
उनके जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री, लेडीज़ फ़र्स्ट, 2017 में रिलीज़ हुई थी। इस फिल्म ने लंदन इंडिपेंडेंट फिल्म फेस्टिवल में एक अवार्ड  भी जीता और ऑस्कर में शार्ट डॉक्यूमेंट्री केटेगरी में भी नॉमिनेट हुई ।यहां तक कि उन्हें एक फिल्म भूमिका के लिए ऑफर मिला पर समझ में आ गया कि इससे तीरंदाजी छूट जाएगी। ये बड़ा सही फैसला था और दीपिका की नज़र अब ओलंपिक पोडियम पर है।

– चरनपाल सिंह सोबती