जिसने नेशनल टाइटल जीतने के बारे में नहीं सोचा – अब टोकियो जा रही है

जिसने नेशनल टाइटल जीतने के बारे में नहीं सोचा – अब टोकियो जा रही है 
Sports Ministry ने टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (Target Olympic Podium Scheme – TOPS)  के कोर ग्रुप में शामिल खिलाड़ियों की जो नई लिस्ट घोषित की उसमें एक नाम पहलवान सीमा बिस्ला का भी है। ये वही सीमा है जिसने सोफिया, बुल्गारिया में मई 2021 में वर्ल्ड ओलंपिक कुश्ती क्वालीफायर सेमीफाइनल में पोलैंड की अन्ना लुकासीक (यूरोपीय ब्रॉन्ज़ विजेता) पर 2-1 से जीत हासिल की और इसी से ओलंपिक में उनकी जगह पक्की हो गई – 50 किग्रा केटेगरी में। एशियाई चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ विजेता सीमा ने क्वार्टर फाइनल में बेलारूस की अनास्तासिया यानोटवा को 8-0 से और 2018 यू थ ओलंपिक चैंपियन स्वीडन की एम्मा जोना मालमग्रेन को 10-2 से हराकर आखिरी 4 में जगह बनाई थी ।

वे एक कैंसर पीड़ित किसान पिता की बेटी हैं – इसलिए परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। ऐसे में ट्रेनिंग और अच्छी डाइट के लिए पैसे कहाँ से आते? सुशीला देवी बड़ी बहन हैं – परिवार की दिक्कत देखकर बड़ी बहन सुशीला ने सीमा को अपने पास रोहतक बुला लिया। कुश्ती की शुरूआत  भले ही गाँव में पिता आजाद सिंह के दो एकड़ के खेत में हुई थी पर ट्रेनिंग मिली रोहतक में। पहले कोच थे ईश्वर सिंह दहिया (2016 ओलंपिक ब्रॉन्ज़ विजेता साक्षी मलिक के पहले कोच भी वही थे)।जब उसने रोहतक के छोटू राम स्टेडियम में  ट्रेनिंग ली थी – कुछ हासिल नहीं हुआ था। अब सीमा अपनी इस कामयाबी का बहुत कुछ श्रेय कोच परमजीत यादव को देती हैं और उनका कहना है कि कोच ने उनका कुश्ती करियर बदल दिया। ये गलत नहीं। कोच की मदद से इंडियन रेलवे में 2017 में क्लर्क की नौकरी  मिल गई। नौकरी मिलने के बाद परमजीत से ही ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया – उनकी एकेडमी में पहले गुरुग्राम में और फिर फारुख नगर में।
इसीलिए सीमा कहती हैं कि तब तक ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना तो दूर, उन्होंने नेशनल टाइटल तक जीतने के बारे में नहीं सोचा था। जिसने 2017 तक नेशनल टाइटल तक नहीं जीता था, वह अब सबसे बड़े मंच पर मुकाबला करने जा रही है। खुद पहलवान रह चुके परमजीत  ने देखा कि सीमा के पास अच्छी तकनीक  है पर शरीर में इतनी ताकत नहीं कि दूसरों को रोक सके। डाइट के नाम पर सिर्फ दूध और घर का बना खाना- तो मजबूत कैसे बनती? कोच ने डाइट में सप्लीमेंट, ड्राई फ्रूट और मल्टी-विटामिन जोड़े- बस खेल बदलना शुरू हो गया। सीमा उस पहलवान में बदल गई जो हर मुकाबले के लिए तैयार थी। इस वक्त सीमा के पास पाँच इंटरनेशनल मैडल हैं पर WFI के साथ कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं, कोई स्पांसर नहीं पर वह चिंता नहीं करती। उनके सफर की एक झलक :
*  पुणे में 2009 एशियाई कैडेट चैंपियनशिप : ब्रॉन्ज़ ।
*  2012 तक, कंधे और गर्दन की चोट के कारण वजन बढ़ गया और उस साल 67 किग्रा जूनियर नेशनल जीता ।
*  2012 और 2013 की एशियाई जूनियर चैंपियनशिप : ब्रॉन्ज़ ।
*  इसके बाद अपना वजन घटाया और 2015 और 2016 में सीनियर नेशनल में  53 किग्रा केटेगरी : ब्रॉन्ज़ ।
*  2018 में जब विनेश फोगट 53 किग्रा केटेगरी में आ गई तो सीमा ने वजन और घटाया 50 किग्रा केटेगरी में आ गई।
अब टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम की मदद है बेहतर ट्रेनिंग के लिए और सीमा तैयार है।  
– चरनपाल सिंह सोबती

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