India to be in this Olympic Sports for the first time…

भवानी देवी : ओलंपिक में जिस खेल में 36 मैडल – उसमें पहली बार भारत से कोई हिस्सा लेगा

इसलिए ये ऐतिहासिक बात है ! रिकॉर्ड बना रही हैं तलवारबाजी (फेंसिंग – Fencing) में भवानी देवी – ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाली पहली भारतीय फ़ेंसर (Fencer) । भवानी ने  Adjusted Official Ranking (AOR) Method के जरिए क्वालिफाई किया। एशिया और ओशिनिया रीजन के लिए 5 अप्रैल, 2021 तक की वर्ल्ड रैंकिंग के आधार पर दो स्पॉट रखे गए थे – इनमें से एक पर तमिलनाडू की भवानी ने अपना नाम लिखाया। वर्ल्ड रैंकिंग में वह नंबर 45 हैं। केंद्रीय खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने भी भवानी को ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने पर बधाई दी। इस तरह उनका फेंसिंग में भारत से क्वालिफाई करना ही रिकॉर्ड है।  


ये किसी से छिपा नहीं कि फेंसिंग भारत में कितना लोकप्रिय खेल है ? भवानी 8 बार की नेशनल चैंपियन हैं और पिछले रियो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाई थीं। टोकियो खेलों के लिए क्वालिफाई करने के लिए शुरू से बेहतर कोशिश की। COVID-19- के लॉकडाउन से जब क्वालिफिकेशन राउंड रुका तो वे कोच निकोला ज़ानोटी के साथ इटली में ट्रेनिंग ले रही थीं।  वह टोकियो 2021 में कटार (Sabre) केटेगरी में हिस्सा लेंगी।जब लॉकडाउन हुआ तो भवानी क्वालिफाई करने के बहुत करीब थी।सालों की मेहनत दांव पर थी।अब खुश हैं कि जीवनकाल के सपने को हासिल किया।ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने की ललक ऐसी थी कि चोटों के साथ भी टूर्नामेंट में हिस्सा लेती रहीं।    

 
ये कहना गलत नहीं होगा कि इस 27 साल की फेंसर ने भारत में तलवारबाजी को एक नई पहचान दी है और अपनी कड़ी मेहनत और पक्के इरादे से इंटरनेशनल स्तर पर तारीफ हासिल की है। फेंसिंग वह खेल है जिस के मैडल पर लगातार यूरोप के देशों ने कब्ज़ा किया हुआ था। चीन, जापान और कोरिया ने इस दब- दबे को चुनौती दी।ओलंपिक में 36 मैडल कोई मजाक नहीं। 
 
अब कुछ भवानी के बारे में – चार बच्चों में से एक, हमेशा प्रोत्साहित करने वाली गृहिणी माँ और पिता पुजारी। पूरा नाम- चल्दावाड़ा आनंद सुंदररमन भवानी देवी (Chadalavada Anandha Sundhararamana Bhavani Devi)। चेन्नई के वाशरमेनपेट (Washermenpet) के एक मध्यम-वर्गीय परिवार से हैं वे। संयोग से सिर्फ 9 साल की उम्र में अपने स्कूल में  फेंसिंग शुरू की ।वह रानी वेलु नचियार, या शिवगंगा की शासक वीरमंगई (Queen Velu Nachiyar, or Veeramangai, the ruler of Sivaganga) की बहादुरी की कहानियों से प्रभावित हैं – कहा जाता है कि उन्होंने 1770 के दशक में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई शुरू की थी। 
 
इसी खेल ने घर से दूर कर दिया – पहले केरल में थालास्सेरी में एक जूनियर के तौर पर और बाद में इटली में लिवोर्नो में ट्रेनिंग के लिए। हर मोड़ पर मुश्किल  – कभी-कभी भारतीय टीम को एशियाई खेलों में नहीं भेजा तो कभी यूरोप में रेफरी का अलग नजरिया। 2019 में अपने पिता को खो दिया। 2020 में महामारी। किस्मत अच्छी थी कि स्पांसर ने साथ नहीं छोड़ा – घर में ही फिटनेस और ट्रेनिंग का इंतज़ाम करा दिया। लॉकडाउन में ढील पर ट्रेनिंग के लिए इटली लौटे। 
 
सच ये है कि भारत में अभी भी ये बहुत लोकप्रिय ओलंपिक खेल नहीं। वजह – ख़ास तरह की महंगी तलवार/ कटार, ख़ास कोचिंग और खेल के ख़ास ड्रेस/ जूते। सब महँगा सौदा – इसीलिए जिसमें कोई ख़ास जोश हो वही फेंसर बनने का इरादा करता है।खुद भवानी ने स्कूल में तलवारबाजी में शामिल होने के लिए झूठ बोला था – पिता की सालाना आमदनी खूब बढ़ा कर बताई क्योंकि गरीब परिवार से हैं तो इस खेल का खर्चा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे – ” शुरुआत में तलवारें बहुत महंगी थीं, हम बांस की डंडियों से खेलते थे और अपनी तलवारों का इस्तेमाल सिर्फ टूर्नामेंट के लिए करते थे क्योंकि अगर हमने उन्हें तोड़ा तो हम खर्चा नहीं कर पाएंगे।भारत में उन्हें खरीदना आसान नहीं है – बाहर से मंगाना पड़ता है।”
 

भवानी मानती हैं कि भारतीय फ़ेंसर्स को अपने से ज्यादा अनुभवी यूरोपीय फेंसर के साथ मुकाबला करने के लिए कुछ ख़ास कोशिश करनी होगी। भारत में फेंसिंग अभी भी एक नया खेल है, बढ़ रहा है जबकि इटली या अन्य कई देश इसमें 100 से ज्यादा सालों से हिस्सा ले रहे हैं। इसलिए, उस स्तर पर आने के लिए उन देशों की तुलना में दोगुना काम करना होगा। अब ये भवानी इसी तलवारबाज़ी में ओलंपिक में हिस्सा ले

रही हैं।  
 
– चरनपाल सिंह सोबती
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