Her Father sold house for training -Story of young Archery Girl…

कोमलिका बारी : ट्रेनिंग के लिए पिता ने घर बेचा, बेटी ने रोज़ 18 किमी साइकिल चलाई और अब ओलंपिक क्वॉलिफाई करने के करीब

इस साल जुलाई में पेरिस में तीरंदाजी रिकर्व टीम इवेंट (Archery Recurve Team Event) के ओलंपिक क्वालिफायर के लिए क्वॉलिफाई करने के लिए पुणे में नेशनल ओलंपिक ट्रायल्स हुए – इनमें झारखंड की तीन महिला तीरंदाज दीपिका कुमारी, अंकिता भकत और कोमलिका बारी ने टॉप किया। अगर पेरिस टीम इवेंट क्वॉलिफायर में अच्छा खेले तो भारत की टीम टोकियो ओलंपिक में तीरंदाजी में टीम इवेंट में हिस्सा ले सकेगी। इन नेशनल ओलंपिक ट्रायल्स में अच्छे प्रदर्शन ने दीपिका, अंकिता और कोमलिका को अगले दो वर्ल्ड कप ( इस साल अप्रैल 19-25 ग्वाटेमाला और 17-25 मई शंघाई) में खेलने का मौका भी दे दिया।इन तीन में से कोमलिका बारी की यहां ख़ास चर्चा कर रहे हैं- क्योंकि इनकी कहानी देश की किसी भी लड़की को अपना सपना पूरा करने की प्रेरणा देगी। 
 
ये वही कोमलिका है जिसने इतिहास रचा था और वर्ल्ड तीरंदाजी युवा चैंपियनशिप (World Archery Youth Championships) में टाइटल जीतने वाली सिर्फ तीसरी भारतीय (पहली : पल्टन हांसदा 2006 में, दूसरी : दीपिका कुमारी 2009 में) बनी थी। ये अगस्त 2019 की बात है – तब बिरसानगर (झारखंड) की 17 साल की ये लड़की मैड्रिड में चैंपियनशिप में रिकर्व कैडेट इवेंट (Recurve Cadet Event) में रैंकिंग राउंड के बाद 15 वें नंबर पर थी पर गोल्ड जीतने के लिए दो कोरियाई और एक जापानी सहित पांच  खिलाड़ियों को मुकाबले में हराया। संयोग से लगभग उसी समय समय पीवी सिंधु ने वर्ल्ड बॅडमिंटन चैंपियनशिप का बड़ा टाइटल जीता और सारी चर्चा सिंधु ले गईं।  
 
ये वही कोमलिका है जो 2016 में टाटा तीरंदाजी एकेडमी (Tata Archery Academy) में आने से पहले चार साल तक सिर्फ पारंपरिक भारतीय धनुष (बांस से बने) के साथ ट्रेनिंग ले रही थी। कोमलिका ने अपने चचेरे भाई को तीर चलाते देखा तो खुद भी धनुष उठा लिया। पहली कोचिंग आईएसडब्लूपी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, जमशेदपुर (ISWP Sports Complex,Jamshedpur ) में मिली और उसके बाद टाटा एकेडमी में कोच धर्मेंद्र तिवारी और पूर्णिमा महतो से। टाटा एकेडमी ने वास्तव में निखारा। उनकी ट्रेनिंग में कोच सुरिंदर सिंह और अनिल कुमार भी जुड़े। दो साल पसीना बहाया। 
 
2018 में खेलो इंडिया में हिस्सा लिया पर कुछ ख़ास नहीं किया। 2019 से सब बदला- खेलो इंडिया में अंडर 17 रिकर्व में गोल्ड, फरवरी में जूनियर नेशनल्स में गोल्ड और मार्च में सीनियर नेशनल्स में टीम इवेंट में सिल्वर जीता। इसी से 2019 की शुरुआत में इंटरनेशनल मुकाबलों में हिस्सा लेने का सिलसिला शुरू हुआ – दक्षिण एशियाई चैंपियनशिप (South Asian championship) से और इसी से तुर्की और जर्मनी वर्ल्ड कप, नीदरलैंड में वर्ल्ड चैंपियनशिप और ओलंपिक टेस्ट इवेंट जैसे मुकाबलों के लिए भारत की टीम में जगह बनाई। उनके लिए आसान नहीं था अंडर 17 से अंडर 21 रिकर्व में आना और इंटरनेशनल मुकाबलों तक पहुंचना।
 
कोमलिका बारी का ये जिक्र उनकी माँ और पिता की बात किए बिना अधूरा रह जाएगा। माँ ने पढ़ाई सुधारने के लिए जो टिप्स दिए, वे तीरंदाजी सुधारने में बड़े काम आए।एक समर तीरंदाजी कैंप में उनकी प्रतिभा को सुशांतो पात्रो ने पहचाना और टाटा एकेडमी में सीट दिलाने में मदद की। मां (लक्ष्मी बारी) और पिता (घनश्याम बारी) ने पैसे की तंगी के बावजूद उसका पूरा साथ दिया- खेल के सामान और ट्रेनिंग के इंतज़ाम के लिए अपने घर का एक हिस्सा भी बेच दिया है।और पैसा जुटाने के लिए इंश्योरेंस एजेंट बन गए और घूम घूम कर पॉलिसी बेचीं।
बिरसानगर के अपने घर से टाटा एकेडमी आने जाने के लिए रोज़ 18 किलोमीटर साइकिल चलाना कोई मज़ाक है क्या ? वे मानती हैं कि हर कोच ने भी बड़ी मदद की। इसी से सब कुछ जल्दी जल्दी हो पाया।वह एथलीट है और बड़े मुकाबलों के लिए सही टेंपरामेंट है उसमें लेकिन अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है। पिता का सपना है वह टोकियो ओलंपिक में हिस्सा ले। उन्होंने बड़ी कीमत चुकाई है इस सपने के लिए –  तीरंदाजी उपकरण खरीदने के लिए पैसे नहीं तो घर का एक हिस्सा बेच दिया पर उसकी ट्रेनिंग को जारी रखा।
– चरनपाल सिंह सोबती
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