Gold Medal in International Tournament within 261 days of surgery !!!

सर्जरी के 261 दिन बाद एक इंटरनेशनल टूर्नामेंट में गोल्ड जीतना कोई मजाक है क्या ? 

 
तारीखें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या ऐसा हो सकता है ? 
 
11 मार्च 2020 : जॉर्डन में ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट के दौरान भारत के बॉक्सर मनीष कौशिक के दाहिने बाजू में ऐसी चोट लगी कि उस समय लगा था कि बॉक्सिंग करियर ख़त्म।तब भी लॉक डाउन के कारण सही इलाज तक नहीं मिला। 
18 जून 2020 : डॉ. पारदीवाला ने सर्जरी की मुंबई में और कई महीने का रिहेबिलिटेशन।  
6 मार्च 2021 : भारतीय समय के अनुसार रात लगभग 11 बजे वे पोडियम पर थे , गले में गोल्ड और जन गण मन….  राष्ट्र गान सुनाई दे रहा था यानि कि सर्जरी के सिर्फ 261 दिन बाद एक इंटरनेशनल टूर्नामेंट में गोल्ड जीत लिया। भारत में बहुत कम खेल प्रेमी ये नज़ारा देख रहे थे।  
 
ये सब कल्पना नहीं सच है।  
 
भारत ने हाल ही में कास्टेलन(Castellon), स्पेन में 35 वें बॉक्सम इंटरनेशनल टूर्नामेंट (Boxam International Tournament) में हिस्सा लिया। इस बात को बड़ी चर्चा मिली कि टूर्नामेंट से भारत ने एक गोल्ड ,8 सिल्वर और एक ब्रॉन्ज़ हासिल किए- ब्रॉन्ज़ मैरी कॉम को मिला। गोल्ड की गिनती ज्यादा हो सकती थी पर COVID -19 ने असर डाला – कहीं भारत के मुक्केबाज़ पॉजिटिव तो कहीं दूसरे मुक्केबाज़ के पॉजिटिव होने का नुक्सान।

भारत के लिए अकेला गोल्ड मनीष कौशिक (63 किग्रा) ने हासिल किया यानि कि चोट से लगभग एक साल बाहर रहने के बाद शानदार वापसी की। इरादे  के पक्के और टोकियो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर चुके हैं। इस तरह वापसी के बाद पहले ही टूर्नामेंट में गोल्ड हासिल कर लिया। यह उनकी मेहनत और पक्के इरादे का नतीजा है। 
 
पिछले साल मार्च में जॉर्डन में ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट के दौरान उनके दाहिने बाजू में चोट लगी। हालात ऐसे थे कि सही इलाज तक नहीं मिला।जब टीम और मनीष भारत लौटे तो उन्हें  किसी विशेषज्ञ तक को को नहीं दिखाया जा सका- ऐसे में मनीष भिवानी में अपने घर चले गए। लॉकडाउन के चलते मई में ही सर्जरी होना तय हुआ- हालात कुछ सुधरे थे तो मनीष को मुंबई ले आए थे।18 जून 2020 को डॉ.दिनशॉ पारदीवाला ने सर्जरी की। उसके बाद आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में रिहेबिलिटेशन का लंबा प्रोग्राम चला।वे टूट न जाएं – इसलिए स्पोर्ट्स साइकॉलॉजिस्ट मुग्धा बावरे को भी बुला लिया। अभिनव बिंद्रा की ऑटो बायोग्राफी और ‘द चैंपियंस माइंड’ जैसी किताबें पढ़ीं। इस सब के बाद नेशनल कैंप में आने की हरी झंडी मिली। वहां की मेहनत रंग लाई और सर्जरी के 261 दिनों बाद, मनीष ने स्पेन में गोल्ड जीता। 
 
5 मार्च 1996 (कहीं कहीं ये तारीख 11 जनवरी 1996 लिखी है) को हरियाणा के भिवानी से 5 किलोमीटर (3.1 मील) दूर देवसर गाँव में जन्मे मनीष भारत के सबसे प्रतिभाशाली और होनहार मुक्केबाज़ में से एक हैं।एक किसान (सोमदत्त शर्मा) के बेटे, जो अपने पिता के साथ खेतों में ही काम कर रहे थे पर साथ ही, हरियाणा के मुक्केबाज़ वीरेंद्र सिंह, ख़ास तौर पर  जितेन्द्र सिंह और दिनेश कुमार से बड़े प्रेरित थे ।यही प्रेरणा बॉक्सिंग रिंग में ले गई। कॉलेज ऑफ एजुकेशन, भिवानी से ग्रेजुएट मनीष ने अपने कम साधनों के साथ जी रहे परिवार के लिए बेहतर जीवन  जुटाने के लिए, मुक्केबाजी सीखने का फैसला किया।वे भारतीय सेना में जूनियर कमीशन अधिकारी (JCO) हैं।भारतीय सेना में नौकरी ने न सिर्फ इसमें मदद की,  जुनून पैदा किया।   
 
2017 की सीनियर नेशनल चैंपियनशिप से शुरुआत हुई। नेशनल चैंपियन बने  2017 में जब पिछले विजेता शिवा थापा को हराया।गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ खेलों में सिल्वर से दिखा दिया कि रुकने वाले नहीं। 2019 में वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ हासिल किया। उसके बाद गोल्ड तक का ये सफर कोई आसान नहीं था। अब नज़र टोकियो पर है। 
 
– चरनपाल सिंह सोबती   
Feature image is symbolic
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