Daughter of Tea Estate Worker now a Rugby Global Campaigner !

विश्वास कीजिए – भारत के एक चाय मजदूर की बेटी रग्बी की ग्लोबल मुहिम में हिस्सेदार है !

 भारत में रग्बी खेली जाती है – ये भी नहीं पता तो ये कैसे विश्वास कर लें कि एक भारतीय लड़की को रग्बी की लोकप्रियता बढ़ाने की ग्लोबल मुहिम के लिए चुना गया। बहरहाल ये सच है।  वर्ल्ड रग्बी का ‘अनस्टॉपेबल’ अभियान है इस खेल की सभी स्तर पर महिलाओं और लड़कियों में जागरूकता बढ़ाने के लिए – रग्बी खेलने वाली लड़कियों की प्रेरणा देने वाली कहानियों की बदौलत। बताया कि रग्बी ने कैसे उन्हें सशक्त बनाया? लड़कियाँ किसी से कम नहीं और उन के पास मैदान में और बाहर बराबर मौके हैं।

इनमें से एक है एक टी एस्टेट में काम करने वाले मजदूर की बेटी, 20 साल की बंगाल की लड़की संध्या राय।वह एशिया रग्बी के ‘अनस्टॉपेबल’ अभियान में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली तीन महिलाओं में से एक है – इस लिस्ट में टॉप 32 एशियाई महिला रग्बी खिलाड़ी शामिल हैं।इस अभियान ने न केवल एशिया और भारत भर की लड़कियों और महिलाओं को रग्बी खेलने के लिए प्रेरित किया, इन महिलाओं की प्रेरणा देने वाली दास्तान को सामने लाने के लिए एक मंच दिलाया – जहाँ आज वे हैं, उसके लिए किस तरह की मुश्किलों का सामना किया ?

 
संध्या का जन्म और बचपन उत्तरी बंगाल में सिलीगुड़ी ईस्ट के बैकुंठपुर जंगल के करीब हुआ।स्कूल खत्म होने के बाद अपने माता-पिता के साथ एस्टेट में चाय की पत्ती तोड़ती थी पर रग्बी ने उसे इससे भी रोमांचक भूमिका से जोड़ दिया।रग्बी सीखने वाली गाँव की लड़कियों में वह भी थी। रग्बी ने उसे सरस्वतीपुर से पार पहुंच दिया। ये पेड़ों से तीन तरफ से घिरा हाथी झुंडों का इलाका है जिसमें एक ओर तीस्ता बहती है। विकास के नाम पर हालत ये कि हाल ही में गांव में बिजली पहुंची है और दसवीं से आगे की पढ़ाई दुर्लभ, खासकर लड़कियों के लिए।
 
फादर जॉर्ज मैथ्यू वहां रग्बी लाए। 2013 में, कोलकाता से कुछ रग्बी के शौकीन बुलाए बच्चों को ट्रेनिंग देने के लिए। संध्या और कुछ अन्य लड़कियां इतना अच्छा खेलीं कि हर उम्मीद से आगे निकल गईं। इस सुदूर गांव की 9 लड़कियां अब तक भारत के लिए रग्बी खेल चुकी हैं।
 
23 दिसंबर 2020 को संध्या को ग्लोबल अभियान “अनस्टॉपेबल” में भारतीय चेहरे के रूप में लिया गया। उनके साथ 17 साल की सुमित्रा नायक और 26 साल की वाहिब भरूचा भी हैं।  
सुमित्रा ओडिशा (जिला जाजपुर) की रहने वाली हैं – झुग्गियों (शांति स्लम्स) में रहने वाली सुमित्रा को क्वीन ऑफ़ रग्बी कहते हैं। बड़े रूढ़िवादी गांव की हैं जहाँ लड़कियों को कोई आज़ादी नहीं थी। सभी मुश्किलों को पार करते हुए सुमित्रा ने पहला स्टेट मैच 2012 में खेला। दो साल बाद अंडर -13 महिला रग्बी वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया, उसके बाद नेशनल चैम्पियनशिप और नेशनल स्कूल गेम्स। पिछले साल दुबई में एशियन गर्ल्स रग्बी सेवन्स (अंडर -18) में ब्रॉन्ज़ जीतने में अपनी टीम की मदद की। 
 
वाहबि के लिए खेल घर पर शुरू हुआ। दादा मुक्केबाज और पहलवान जबकि पिता कॉलेज में मुक्केबाज थे और फुटबॉल और हॉकी भी खेलते थे। पहली बार 2006 में स्कूल में एक समर कैंप के दौरान रग्बी के बारे में जाना और खेलना शुरू कर दिया। एक बार 2017 में फिटनेस टेस्ट में फेल रहने के कारण टीम से बाहर कर दिया गया लेकिन वापसी की और कप्तान भी बनीं। वे पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं।
 
संध्या ने  “Pass for Passion” मुहिम शुरू की है खेलो रग्बी प्रोजेक्ट के लिए धन जुटाने के लिए जो उनके जैसे युवा खिलाड़ियों के लिए मौके जुटाता है। कोलकाता के फिल्म निर्माता रोहन चक्रवर्ती ने उनकी कहानी पर एक शार्ट फिल्म बनाई है, जिसमें गाँव की लड़कियों पर उनके रग्बी खेलने के असर को दिखाया है। संध्या ने कोलकाता में स्पोर्ट्स मैनेजमेंट की पढ़ाई की। जब घर लौटें तो सुबह और दोपहर के समय गांव के बच्चों को रग्बी की कोचिंग देती हैं ।
 
– चरनपाल सिंह सोबती 

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