Is Motor Racing becoming Popular in India?

रेसर जेहान की फॉर्मूला 2 चैंपियनशिप में कामयाबी क्या भारत में मोटर रेसिंग को और चर्चा दिलाएगी ?
भारत में मोटर रेसिंग पर कितना कम ध्यान दिया जाता है, इसका सबूत ये है कि 22 साल के रेसर जेहान दारुवाला की फॉर्मूला 2 चैंपियनशिप में कामयाबी की खबर को न तो कोई चर्चा  मिली और न ही उस पर ध्यान दिया गया। इसकी सबसे ख़ास वजह ये है कि भारत में अभी भी मोटर रेसिंग वह खेल है जो आम जन मानस तक नहीं पहुंचा है। एक बहुत महंगा खेल, ज्यादा जगह की जरूरत,प्रैक्टिस भी बहुत महंगी और सरकारी मदद नहीं – ये सभी वे फ़ैक्टर हैं जिनके कारण मोटर रेसिंग के तार आम जान मानस से नहीं जुड़े। 
 सबसे पहले बात करते हैं जेहान की फॉर्मूला 2 चैंपियनशिप में कामयाबी की। 32 लैप (चक्कर) की रेस में एक समय नंबर 19 पर होने के बावजूद जेहान ने बहरीन ग्रांड प्री रेस में मौजूदा चैंपियनशिप लीडर मिक शुमाकर को पीछे रख अपना पहला फॉर्मूला 2 पोडियम हासिल किया। आख़िरी राउंड में तकनीकी तौर पर फायदे की स्थिति में होने के बावजूद मिक शुमाकर का जोश जेहान को रोक नहीं पाया। एफआईए फॉर्मूला 3 चैंपियनशिप में पिछले साल जेहान दूसरे रनर अप थे। 
ऐसा नहीं है कि भारत में मोटर रेसिंग को लोकप्रियता दिलाने की कोशिशें नहीं हुईं। फिर भी पिछले कई सालों में दो नाम ही ऐसे रहे जो चर्चा में आए। पहला नारायण कार्तिकेयन का जो 1 फरवरी 2005 को भारत के पहले फॉर्मूला वन रेसिंग ड्राइवर बने। मार्च 2007 में, वे NASCAR सीरीज में हिस्सा लेने वाले पहले भारत में जन्मे ड्राइवर बने।दूसरा  करुण चंढोक का। सिर्फ इन्हीं दोनों भारतीय ने फॉर्मूला 1 सर्किट में हिस्सा लिया। 
भारत में मोटरस्पोर्ट थी पर पेशवर मुकाबले के स्तर तक नहीं पहुँची। करुण के दादा इंदु चंद्रोक ने 1960 के दशक में मोटर रेसिंग की चैंपियनशिप शुरू की, नेशनल फेडरेशन, फेडरेशन ऑफ मोटर स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया (FMSCI) और मद्रास मोटर स्पोर्ट्स क्लब (MMSC),भारत में सबसे पुराना मोटर स्पोर्ट्स क्लब, के संस्थापक सदस्य थे। यहां तक कि उनकी दादी 1970 के दशक में एंबेसडर कारों में रेस लगाती थीं।  
एक रेस के दौरान 60 या 70 हजार दर्शक भी जुटे पर ये ख़ास शौकीन ही थे।एयरफील्ड पर रेस होती थीं।भारत में रेसिंग का पूरा नज़ारा 1990 के दशक में बदल गया। MMSC  ने चेन्नई के बाहर भारत का पहला एफआईए- रेस  ट्रैक बनाने  के लिए टुकड़े-टुकड़े कर 250 एकड़ जमीन खरीदी।तीन बार के फॉर्मूला 1 विश्व चैंपियन सर जैकी स्टुअर्ट ने 1987 में नींव रखी।फरवरी 1990 में उस ट्रैक पर पहली रेस हुई। बहुत कम लोगों को मालूम है कि मारुति ने रेसर कार भी बनाई थीं तब। भीड़ धीरे-धीरे गायब होने लगी।शायद दर्शकों को पुराने टी आकार के ट्रैक पर रेसिंग देखना पसंद था जहाँ वे एक जगह पर बैठ कर बहुत कुछ देख सकते थे।केबल टेलीविजन की शुरुआत और तेजी से विकास  तथा क्रिकेट ने भी दर्शक छीन लिए।तब एक क्रांति हुई।दो बड़े टायर दिग्गज जेके टायर और एमआरएफ ने मोटर रेस पर बड़ी रकम खर्ची।फरवरी 2004 में कोलकाता में 7 वें जेके टायर नेशनल रेसिंग चैंपियनशिप के दौरान फॉर्मूला मारुति रेसिंग कारों को देखा गया। तब भी  फॉर्मूला 1 के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी।भारत में एफ 1 रेस का पहला लाइव टेलीकास्ट प्राइम स्पोर्ट्स पर 1993 का स्पेनिश ग्रां प्री था ! माइकल शूमाकर के दौर ने देश भर  में एफ 1 में एकदम रुचि बढ़ा दी। नारायण कार्तिकेयन  इसी दौर में चमके । करुण तब स्कूल में थे और उनकी तो रगों में मोटर रेसिंग थी।उनके परिवार ने उनके सपने को जिंदा रखने के लिए जो कुछ भी था,उसे बेच दिया / गिरवी रख दिया। 
फिर भी स्कोरकार्ड ये है कि 1.3 बिलियन से ज्यादा की आबादी में से सिर्फ दो ने फॉर्मूला 1 रेस में हिस्सा लिया है।2011 और 2013 के बीच इंडियन ग्रां प्री शुरू हुई। इसके बाद लक्ष्य था भारत में  एफ 1 ट्रैक बनाना। जेपी  ग्रुप ने पैसा लगाया। फॉर्मूला 1 रेस भी हुई। इसके बावजूद नज़ारा नहीं बदला है और यह महंगा खेल कई मुश्किलों से जूझ रहा है। 
– चरनपाल सिंह सोबती  

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