When a differently able sportsman starts academy

जहां इरादा पक्का हो, रास्ता बन ही जाता है 
इस  भारत देश की आबादी 130 करोड़ से ज्यादा और उसमें क्रिकेट के दीवाने भी कई करोड़ – तब भी क्या कुछ ने सुवरो जोर्डर का नाम सुना है? नहीं सुना होगा। इनके दो ख़ास परिचय हैं :1. वे विश्व के पहले ब्लेड क्रिकेटर  हैं। 2. वे भारत की शारीरिक रूप से विकलांग क्रिकेट टीम के कप्तान हैं। इन दोनों परिचय से अपने आप अंदाज़ा हो जाना चाहिए कि वे लगन और मेहनत के कितने धनी हैं। इन मुश्किलों के बावजूद क्रिकेट खेली – ये कोई मामूली बात नहीं है। 

खेलना तो चल रहा है।अब वे एक नए मिशन पर है।सुवरो दक्षिण कोलकाता के विवेकानंद पार्क में एक एकेडमी शुरू कर रहे हैं जिसमें जरूरतमंद महिलाओं और विशेष रूप से विकलांग क्रिकेटरों के साथ-साथ जरूरतमंद और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मुफ्त ट्रेनिंग मिलेगी।एकेडमी का नाम ‘स्ट्रेट ड्राइव:एन इनीशिएटिव ऑफ़ क्रिकेट एसोसिएशन फॉर फिजिकली चैलेंज्ड बंगाल ‘ है।
मिशन अनोखा और तारीफ वाला है इसीलिए मदद भी मिल रही है।शहर के मेयर ने जमीन दी जिस पर एकेडमी बन रही है।कोविड -19 के चलते एकेडमी  के लिए पैसा इकठ्ठा करना कुछ मुश्किल हो रहा है।इसे शुरू करने में अनुमानित12 लाख रुपये का खर्च का बजट है।एकेडमी में सभी आधुनिक सिस्टम और जरूरतों जैसे जिम,स्पोर्ट्स शॉप,कम बजट की कैंटीन के साथ-साथ ट्रेनिंग लेने वाले क्रिकेटरों के लिए 7-8 बेहतर दर्ज़े की पिचों का इंतज़ाम शामिल है। सुवरो ने ही 2016 में क्रिकेट एसोसिएशन फॉर फिजिकली चैलेंज्ड बंगाल (CAPCB) का गठन किया था।इसी एसोसिएशन की कोशिश से 2019 में  बंगाल ने नेशनल चैंपियनशिप ट्रॉफी जीती थी। सुवरो शुरू से ऐसे नहीं थे।2008 में, क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (सीएबी) के तहत लीग क्रिकेट खेल रहे थे,तो एक मोटर साइकिल एक्सीडेंट  में अपना दाहिना पैर खो दिया। लगा कि क्रिकेट करियर तो रातों रात उड़ गया।हिम्मत नहीं हारी और ब्लेड क्रिकेटर के तौर पर लौटे जो किसी के लिए भी एक प्रेरणा होगा।वे उस भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान हैं, जिसे DCCBI (दिव्यांग क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इंडिया) द्वारा चलाया जाता है। पिछले पांच सालों में 37 टी 20 आई खेले हैं। यहाँ तक कि 2019 में,वह क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल की नियमित लीग में खेलने वाले पहले डिसएबल्ड क्रिकेटर बने थे।जब सौरव गांगुली सीएबी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने  आईसीसी की एक कंडीशन  में संशोधन कराया था ताकि जोर्डर  एक रनर के साथ दूसरी डिवीजन लीग में खेल सकें। मैटल के पैर के कारण,वह दुनिया के पहले ब्लेड क्रिकेटर के रूप में पहचाने गए ।
इसीलिए उनकी कोशिश है कि जिस दिक्कत और मुश्किल का सामना उन्होंने किया, दूसरे न करें और उनके लिए हर दरवाजा खुला रहे।नियमित कोचिंग सेंटर, विकलांग को भर्ती करने  में आना -कानी करते हैं जो एक तरह का दिमागी अवरोध है।जोर्डर उसी को बदलना चाहते हैं।विकलांग क्रिकेटरों की ज़रूरतें अलग-अलग हैं और उनका सम्मान करने की ज़रूरत है। उनकी एकेडमी का लक्ष्य क्रिकेट और क्रिकेटरों का प्रचार है। इसलिए वे मदद करना चाहते हैं।दूसरी डिवीजन क्रिकेट खेलने वाले बिनॉय तिर्की चार साल से जोर्डर के साथ ही ट्रेनिंग ले रहे हैं – उनका एक पैर दूसरे के मुकाबले छोटा है।वह कहते हैं कि इस तरह की एक एकेडमी उनके लिए एक उम्मीद है।

Charanpal Singh Sobti

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