ऐसे मौके पर खेलना आसान नहीं होता ! How Hard it is to play in Bio Bubble!


दुबई में 24 अक्टूबर को किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाड़ियों ने सनराइजर्स हैदराबाद के विरुद्ध आईपीएल मैच में बाजू पर काले रंग की पट्टी बाँधी । पहले तो पता ही नहीं लगा कि ऐसा क्यों किया है ? बाद में पता लगा कि टीम के एक क्रिकेटर मनदीप सिंह के पिता का एक दिन पहले ही देहांत हो गया था – ये टीम का उनके प्रति शोक प्रकट करने का तरीका था।वे लंबे समय से बीमार थे।  
ख़ास बात ये कि पिता के देहांत के बावजूद मनदीप टीम के साथ न सिर्फ संयुक्त अरब अमीरात में रुके रहे – मैच भी खेले।14 गेंद पर 17 रन बनाए।ऐसे मौके पर ,सैकड़ों मील दूर किसी अपने की यादों के बीच खेलना आसान नहीं होता।मनदीप ने टीम के अगले मैच में, कोलकाता नाइट राइडर्स के विरुद्ध मैच ,जीतने वाले 66* बनाए और अपने 50 को पिता की याद को समर्पित किया।  
बड़ी तारीफ हुई मनदीप की हिम्मत की।वास्तव में ऐसी खबर सुनकर भी घर न लौटना,टीम के लिए खेलने को ड्यूटी मानकर टीम के साथ रुके रहना आसान नहीं होता।टीम ने अपने स्टार ओपनर मयंक अग्रवाल की गैरमौजूदगी में मनदीप को पारी की शुरुआत की ड्यूटी दी थी। हालाँकि उन्होंने पिछले 3 मैचों में 27,6 और 0 ही बनाए थे पर ये ड्यूटी उनसे अलग थी। 
जैसे ही मनदीप बल्लेबाजी करने उतरे,सनराइजर्स के कुछ खिलाड़ियों, जिनमें स्पिनर राशिद खान भी थे ,ने उन्हें सांत्वना दी।राशिद खान ऐसे मौके का दर्द जानते हैं।कुछ साल पहले, वे बिग बैश लीग में एडिलेड स्ट्राइकर्स के लिए खेल रहे थे तो उन्हें भी अपने अब्बा को खोने की खबर मिली थी।राशिद ने भी तब  खेलना जारी रखने का विकल्प चुना था।
संयोग से किंग्स इलेवन पंजाब – सनराइजर्स हैदराबाद मैच से पहले ,उसी दिन कोलकाता नाइट राइडर्स के नितीश राणा ने दिल्ली केपिटल्स के विरुद्ध अर्धशतक अपने ससुर को समर्पित किया – उनकी भी एक दिन पहले कैंसर से मृत्यु हो गई थी।
अगर ऐसी खबर सुन कर कोई क्रिकेटर टीम/टूर्नामेंट को बीच में छोड़कर घर लौट जाए तो कोई भी उसे गलत नहीं कहेगा।वे हिम्मती होते हैं जो टीम के साथ रुके रहते हैं।जिस कामयाबी का सपना उनके पिता या और किसी नज़दीकी ने देखा,उसके लिए मेहनत की – उसी को तो पूरा कर रहे हैं। 
विराट कोहली की मिसाल का जिक्र जरूरी है।दिसंबर 2006 की बात है।दिल्ली में रणजी मैच में कर्नाटक के 446 के जवाब में दिन का खेल ख़त्म होने पर दिल्ली का स्कोर103- 5 और फॉलो ऑन का खतरा सामने था। विराट (40*) और पुनीत बिष्ट क्रीज़ पर थे।उसी रात विराट के पिता का देहांत हो गया।घर में पिता की लाश को छोड़कर वे फ़िरोज़शाह कोटला पहुँच गए सुबह अपनी अधूरी पारी आगे खेलने क्योंकि टीम को फॉलो ऑन से बचाना था।90 रन बनाए,फॉलो ऑन बचाया और आउट होकर सीधे शमशान गए।तब वे 19 साल वाले क्रिकेटर थे। 
1999 वर्ल्ड कप के बीच सचिन तेंदुलकर के पिता का देहांत हुआ।वे मुंबई लौटे,4 दिन रुके और वापस ड्यूटी पर पहुंचकर केन्या के विरुद्ध शतक बनाया। 
सिर्फ हिम्मत के धनी ऐसा कर पाते हैं। 
– चरनपाल सिंह सोबती

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