What special change woman cricketer of Australia has brought about to bring relief to Women Players?

अब ये सिर्फ फैशन नहीं , जरूरत की भी बात है 
इंग्लैंड में हुई शुरुआत की बदौलत यह कहा जा सकता है कि क्रिकेट की वापसी का सिलसिला शुरू हो गया है। महिला क्रिकेट में पहली इंटरनेशनल सीरीज खेले जाने का इंतज़ार है। लॉकडाउन  के दिनों में पुरुष क्रिकेटरों की तरह , महिला क्रिकेटर भी इंटरव्यू और अपनी सोशल मीडिया पोस्ट की वजह से ख़बरों में बनी रहीं। 
ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेटर एलिसा हीली ऐसी नहीं थीं। अपने परिवार , जिसमें एक ख़ास नाम  क्रिकेटर मिचेल स्टार्क का है जिनकी वे पत्नी हैं , को देखने के साथ साथ  एलिसा ने कुछ ऐसा भी किया जिससे  दुनियाभर की महिला क्रिकेटरों को फायदा होगा।  ये वही  एलिसा  हैं जो अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच  86,174 दर्शकों के सामने खेलीं थीं और उनके 39 गेंद में  7 चौके और 5 छक्के के साथ 75  ने भारत से वर्ल्ड टी 20 टाइटल जीतने का मौका छीन लिया था। 
पिछले कुछ सालों में महिला क्रिकेट ने बहुत प्रगति की – नए टूर्नामेंट और यहाँ तक कि टी 20  की बिग बैश , द हंड्रेड और आईपीएल चैलेंज जैसी सीरीज में खेलने का मौका भी आया। इसीलिए बराबरी की जरूरत महसूस हुई।  आईसीसी ने  Cricket Laws    में ऐसी भाषा का प्रयोग किया कि लगे कि महिला क्रिकेट की भी बात हो रही है। किट बनाने वाली कंपनियों ने उनकी जरूरत को देखकर उन्हें पुरुष क्रिकेटरों वाली ही शर्ट और ट्रॉउज़र पहनने से बचाया। क्रिकेट खेलने का सामान अभी भी अलग नहीं बना रहीं बड़ी कंपनियां। इनका बाज़ार शायद ऐसा  नहीं लग रहा कि मुनाफे का सौदा साबित हो। यही बात जूतों के साथ है। विश्वास कीजिए महिला क्रिकेटरों  को किट में वही जूते मिलते हैं जो कंपनियां पुरुष क्रिकेटरों की जरूरत पूरा करने के लिए बना रही हैं। 
एलिसा हीली  ने कहा -‘ हमारे पैर  लड़कों से बिलकुल अलग हैं। मैं  घर में उनके साथ रहती हूँ जो 6 फुट 5 इंच लम्बे हैं और जूते का नंबर 14  है।  मुझसे बेहतर कौन जानता है अलग जूते की जरूरत  के बारे में। ‘  लॉकडाउन की फुर्सत का फायदा उठाकर  एलिसा ने ऑस्ट्रेलिया की स्पोर्ट्स एपरल कंपनी  Asics   के साथ मिलकर महिला क्रिकेटरों के लिए अलग से जूते डिज़ाइन किए  और आगे वे इसी तरह से और दूसरे इक्विपमेंट पर काम करेंगी जो महिला क्रिकेटरों  के लिए ‘अपना’ होगा।   
एलिसा हीली   ने तो शुरुआत की है एक मुहिम की जिसमें  अभी बहुत कुछ आगे होना है। इस मामले में क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की  कोशिश भी तारीफ वाली है। महिला क्रिकेटरों के  लिए मेटरनिटी  लीव शुरू की। मीडिया रिपोर्ट में हर क्रिकेटर के लिए बैट्समैन /फील्ड्समैन लिखने की जगह ‘ बैटर ‘ और ‘फील्डर ‘लिखना शुरू कर दिया है। अब उनकी हर रिपोर्ट में क्रिकेट के जिक्र में साफ़- साफ़ लिखा रहता है कि यह पुरुष क्रिकेट की है या महिला क्रिकेट की – दोनों का अपनी पहचान में बराबर का हक़ है। 
– चरनपाल सिंह सोबती

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