Right Time To Give New Name To England West Indies Series…By Charanpal Sobati

क्या इंग्लैंड – वेस्टइंडीज टेस्ट सीरीज की  विजडन ट्रॉफी  को नया  नाम देने और BLM  मूवमेंट  से जोड़ने का समय आ गया है  ?
100 दिन से ज्यादा के बाद इंटरनेशनल क्रिकेट की वापसी हुई है और इंग्लैंड -वेस्टइंडीज टेस्ट सीरीज इंग्लैंड में खेली जा रही है। विजेता को मिलेगी विजडन ट्रॉफी। ये एशेज जैसी पुरानी  ट्रॉफी नहीं  पर क्रिकेट की सबसे चर्चित और ऐतिहासिक ट्रॉफी में से एक। इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच टेस्ट तो 1928 में ही शुरू हो गए थे पर विजडन ट्रॉफी का नाम इनके टेस्ट से 1963 की सीरीज से जुड़ा। क्यों और कैसे ?
सच ये है कि 1963 की सीरीज से पहले वेस्टइंडीज के भूतपूर्व क्रिकेटर सर लियरे कॉन्स्टेनटाइन ने  सुझाव रखा था कि इन दोनों टीम के बीच सीरीज किसी ट्रॉफी के लिए खेली जाए और उन्होंने ही विजडन क्रिकेटर्स एल्मनैक के मालिकों को ट्रॉफी देने के लिए तैयार किया । उनका विजडन से पुराना नाता था। 1940 में  वे 5 क्रिकेटर्स ऑफ़ द ईयर में से एक थे और विजडन के मालिक केन मेडलॉक के साथ दोस्ती की वजह से कुछ साल पहले विजडन एंड कंपनी को दीवाला निकलने से भी बचाया था। ये विजडन का 100 वां यानि कि यादगार साल भी था।  
विजडन वाले ट्रॉफी देने के लिए मान गए पर उस समय इंग्लैंड की क्रिकेट के लिए जिम्मेदार MCC ने इंकार कर दिया। तब  सर लियरे कॉन्स्टेनटाइन ने वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड को मनाया और उनके दबाव में  MCC को मानना पड़ा। 1963 में ट्रॉफी जीतने वाले पहले कप्तान फ्रेंक वारेल बने। 
अब नई मुहिम इंग्लैंड के भूतपर्व कप्तान माइक आथर्टन ने शुरू की है। वे कहते हैं इस ट्रॉफी को रिटायर करो , म्यूजियम में रखो  और किसी  नए नाम से नई ट्रॉफी को जोड़ो।असल में जब उन्होंने 2017 में लॉर्डस में विजेता जो रुट को ये ट्रॉफी दी तो इसे हाथ में लेने पर  उन्हें पता लगा था कि इसकी हालत तो बड़ी खस्ता है और बस टूटने वाली है। उन्होंने तो रुट को भी कहा था कि इसे  ध्यान से और मजबूती से पकड़ो।अब वे ट्रॉफी बदले जाने पर बड़ा जोर दे रहे हैं। ट्रॉफी की खस्ता हालत के साथ साथ उनकी दलील ये भी है कि विजडन का इंग्लैंड – वेस्टइंडीज क्रिकेट से  कोई नाता नहीं तो उनके नाम की ट्रॉफी क्यों? 
उन्होंने नए नाम का सुझाव भी दे दिया है – ट्रॉफी इंग्लैंड और वेस्टइंडीज क्रिकेट के इतिहास का प्रतीक हो और मौजूदा Black Lives Matter मूवमेंट का भी संकेत दे। इसलिए ट्रॉफी को  सर लियरे कॉन्स्टेनटाइन का नाम मिले। वे मशहूर क्रिकेटर तो थे ही , साथ में केरेबियन से गुलाम बनाकर इंग्लैंड लाए एक व्यक्ति के पोते तथा House of Lords  में पहुँचने वाले पहले  अश्वेत सहकर्मी ( Peer )  । माइक आथर्टन की इस मुहिम को चर्चा  और समर्थन दोनों मिल रहे हैं। विजडन ने भी कह दिया है कि उन्हें नई ट्रॉफी और नए एवं सामयिक नाम पर कोई आपत्ति नहीं। इस बदलाव का विरोध करने वाले कहते हैं कि  मौजूदा ट्रॉफी की शुरुआत में भी तो  सर लियरे कॉन्स्टेनटाइन का नाम है , तो ट्रॉफी का नाम बदलने की क्या जरूरत है ?-

चरनपाल सिंह सोबती