एक आँख की नज़र खोने के बावजूद पटौदी  कमाल के बल्लेबाज़ थे


फ़िल्म स्टार सैफ अली खान इन दिनों अपने अब्बा और भारत के भूतपूर्व कप्तान  मंसूर अली खान उर्फ़ नवाब पटौदी पर बायोपिक बनाने के  प्रोजेक्ट पर बड़ी मेहनत कर रहे हैं। उनसे जुड़ी बातों और घटनाओं को याद किया जा रहा है, इकट्ठा किया जा रहा है  और सिलसिलेवार लिखा  जा रहा है ताकि बायोपिक का काम आगे बड़े। वैसे तो  मंसूर अली खान के अब्बा इफ्तिखार  अली खान भी क्रिकेट खेले पर जो मशहूरी  मंसूर अली खान  को मिली उसका जवाब नहीं। वे  ‘टाइगर ‘ के निकनेम से भी बड़े मशहूर थे जो उन्हें बेहतरीन फील्डिंग के लिए मिला था क्योंकि खास तौर पर कवर में गेंद पर चीते की तरह झपटते थे। 
पटौदी ने 46 टेस्ट खेले जिनमें 2793 रन बनाए 6 सेंचुरी के साथ।  एक ऐसे समय में जबकि किसी भारतीय बल्लेबाज़ का 100 बनाना बहुत बड़ी उपलब्धि गिना जाता था , ये कमाल का रिकॉर्ड था। वे इनमें से 40  टेस्ट में कप्तान रहे थे और इसी से अंदाजा हो हो जाता है कि किस तरह की जिम्मेदारी के साथ खेले। 
उनकी बल्लेबाज़ी का जिक्र आने पर इस बात को हमेशा  एक ख़ास चर्चा मिलती है कि जुलाई 1961 में एक कार एक्सीडेंट में विंडस्क्रीन का कांच लगने से उनकी दांई आँख की रोशनी चली गई थी। सिर्फ एक आँख में रोशनी के साथ कौन क्रिकेट खेलने के बारे में सोचता? उन्होंने न सिर्फ सोचा , आज जैसी ट्रेनिंग और मेडिकल सुविधाएँ न होने के बावजूद मेहनत  की  और दिसंबर 1961 में ही अपने पहला टेस्ट खेल रहे थे। 
इस नज़रिए से उनका टेस्ट रिकॉर्ड और भी बेमिसाल हो जाता है। उन्होंने खुद कभी इस कमी  या इस वजह से बैटिंग में  आ रही दिक्कत का जिक्र नहीं किया।  बस अपना स्टान्स बदला , वे स्ट्रोक चुने जो  खेल सकते थे और अपने समय में उन्हें तकनीकी तौर पर विश्व के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज़ में  से एक गिना जाता था।  
सैफ ने एक घटना का जिक्र किया। अपने समय में इंग्लैंड के तकनीकी तौर पर सबसे सही बल्लेबाज़ों में से एक और हाल के सालों में  टेलीविज़न कमेंटेटर के तौर पर मशहूर हुए ज्यॉफ बॉयकॉट ने एक मुलाकात में सैफ से बात करते हुए कहा – ‘ मैंने तुम्हारे पिता  के बारे में बहुत सुना है  पर एक आँख के साथ इतनी बेहतरीन क्रिकेट खेलना संभव नहीं है। ‘ 
इस पर सैफ ने पूछा कि क्या इसका मतलब ये हुआ  कि वे एक आँख में रोशनी न होने के बारे में झूठ बोल रहे हैं ? तो  बॉयकॉट ने जवाब में साफ़ साफ़ कह भी दिया कि उन्हें तो ऐसा ही लगता है। 
जब सैफ ने ये बात पटौदी  ( जो उस समय जीवित थे ) को बताई तो उन्हें बड़ा गुस्सा आया।  वे बोले-‘ अगर एक आँख के साथ मैं ऐसा बेहतर बल्लेबाज़ था तो दो आँख के साथ तो और भी बेहतर था। ‘ पटौदी ने  एक आँख में  रोशनी न होने को कभी तरस खाने वाला किस्सा नहीं बनने दिया।

भारतीय टीम की जिस मजबूती का सौरव गांगुली के साथ शुरुआत का जिक्र किया जाता है , वास्तव में उसकी बुनियाद पटौदी की कप्तानी  के दौर में रखी  गई थी। आज की जनरेशन को बायोपिक के जरिए पटौदी की मेहनत और नवाबी शान भूलकर क्रिकेट खेलने की चाह के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा।

– चरनपाल सिंह सोबती 

Charanpal Singh Sobti 

SPORTSNASHA
www.sportsnasha.com is a venture of SRC SPORTSNASHA ADVISORS PVT LTD. It is a website dedicated to all sports at all levels. The mission of website is to promote grass root sports.
http://www.sportsnasha.com